भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के ताम्रपत्रों का हो रहा डिजिटलाइजेशन

India’s ancient medical heritage preserved at the National Institute of Indian Medical Heritage (NIIMH), Hyderabad, showcases rare manuscripts, artefacts, and the SAHI 2.0 digitisation initiative, highlighting Ayurveda’s evolution over centuries.

भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का रिकॉर्ड वैसे तो देश में जगह जगह बिखरा पडा है और बहुत सारा ज्ञान भारतीय ज्ञान परंपरा के मुताबिक लोगों तक पहुंचा है। लेकिन हैदराबाद में आयुष मंत्रालय का एक ऐसा संस्थान है, जिसमें में 900 से अधिक मेडिको-हिस्टोरिकल (चिकित्सा-ऐतिहासिक) कलाकृतियां संरक्षित हैं, जिनमें कुछ करीब 1,000 वर्ष पुरानी हैं। इनमें ताड़पत्र, कागज, छाल, कपड़े और धातु की प्लेटों पर लिखी हस्तलिखित पांडुलिपियां शामिल हैं, जो यह दर्शाती हैं कि विभिन्न कालखंडों में चिकित्सा ज्ञान को किस तरह संरक्षित किया जाता था। भारतीय परंपरिक चिकित्सा पद्धति के इतिहास को देखते हुए यह संस्थान काफी महत्वपूर्ण है। जिसका डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है।

SAHI 2.0: डिजिटलीकरण की बड़ी पहल

Central Council for Research in Ayurvedic Sciences द्वारा विकसित SAHI (Showcase of Ayurvedic Historical Imprints) 2.0 परियोजना के तहत इन विरासतों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है। यह पोर्टल आयुर्वेद की यात्रा को प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक समय तक दर्शाता है और दुनिया के साथ भारत के चिकित्सा संबंधों को भी उजागर करता है।

केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री Prataprao Jadhav ने कहा, “भारत की चिकित्सा विरासत केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि जीवित ज्ञान की निरंतर परंपरा है।”

पांडुलिपियों की अहमियत

SAHI परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डॉ. गोली पेंचला प्रसाद के अनुसार, पांडुलिपियां कागज, छाल, कपड़े, धातु या ताड़पत्र पर लिखी हस्तलिखित रचनाएं होती हैं। ये अक्सर मंदिरों, मठों और पारंपरिक वैद्य परिवारों के निजी संग्रहों में पाई जाती हैं।
इस परियोजना के तहत कई महत्वपूर्ण खोजें सामने आई हैं। इनमें चालुक्य वंश के राजा विक्रमादित्य प्रथम के शासनकाल का 1,660 वर्ष पुराना तांबे का अभिलेख शामिल है, जो बताता है कि उस समय चिकित्सकों को प्रशासनिक अधिकार भी प्राप्त थे।
इतिहास में प्रसिद्ध वैद्य Jivaka का उल्लेख भी मिलता है, जिन्होंने भगवान बुद्ध और राजा बिंबिसार का उपचार किया था। यह दर्शाता है कि भारत में चिकित्सा प्रणाली कितनी संगठित और विकसित थी।
NIIMH की स्थापना और विकास
इस संस्थान की नींव Bhore Committee की 1944 की सिफारिशों पर रखी गई थी। 1956 में इसे आंध्र मेडिकल कॉलेज, विशाखापत्तनम में शुरू किया गया और बाद में हैदराबाद स्थानांतरित कर दिया गया।
2009 में इसे वर्तमान स्वरूप में उन्नत किया गया और आज यह Indian Council of Medical Research सहित विभिन्न संस्थानों के सहयोग से विकसित होकर एक प्रमुख शोध केंद्र बन चुका है।
ज्ञान का विशाल भंडार
आज NIIMH में 10,000 से अधिक पुस्तकें, 285 पांडुलिपियां और एक विशेष मेडिको-हिस्टोरिकल म्यूजियम मौजूद है। यह संस्थान भारत की चिकित्सा विरासत को न केवल संरक्षित कर रहा है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का भी काम कर रहा है।

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